Saturday, July 1, 2017

अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉग दिवस


ब्लॉग जगत के सभी मित्रों को प्रणाम ! यहाँ सक्रिय होने का प्रयास सफल हो यही कामना है. इस कोशिश में शामिल होते हुए कुछ यादों को आज के दिन बाँटने का चाह जागी. इसमें कोई दो राय नहीं कि आभासी दुनिया में फेसबुक ने ब्लॉग जगत को पीछे छोड़ दिया है. ब्लॉगर ऐसा है जिसे ब्लॉग जगत से मोह है तो फेसबुक का आकर्षण भी कम नहीं. मैं अपनी बात करती हूँ न मैं ब्लॉग जगत में सक्रिय हूँ न ही फेसबुक पर लेकिन साथ जुड़े रहने की चाह दोनों से ही विदा नहीं लेने देती. 

जनवरी २०१७ दिल्ली के पुस्तक मेले में जाने का पहला मौका और उस पर कई ब्लॉगर मित्रों से रूबरू मिलना बेहद खुबसूरत रहा. ब्लॉग में लिखने का टलता रहा हालांकि कुछ छोटे छोटे ड्राफ्ट्स हैं जिन्हें as it is पोस्ट किया जा सकता था लेकिन आलस शायद हाँ यही एक कारण है कि लिखने का काम रह जाता है. पढ़ कर उसका जवाब मन ही मन में सोच कर ही तसल्ली हो जाती. एक और कारण भी है. पढने में ही वक़्त ख़त्म हो जाता है और फिर असल जिंदगी के काम शुरू हो जाते वैसे भी सोचा कराती हूँ किसे फुर्सत है मेरे लिखे को पढने का. 
खैर यादगार पल थे पहली बार दिल्ली के पुस्तक मेले में जाना और अपने प्रिय ब्लॉगर मित्रों से रूबरू मिलना. फेसबुक पर भी कुछ यादें दर्ज हुई हैं लेकिन अपने ब्लॉग में सहेजने का मज़ा भी अलग है. आज ब्लॉग दिवस पर एक पोस्ट सबके नाम -- 

विश्व पुस्तक मेले में पहला दिन 






#हिंदी_ब्लॉगिंग







विश्व-पुस्तक मेला (पहला दिन)



विश्व-पुस्तक मेला जनवरी 2017


बरसों बाद जब भारत आने का मौका मिला तो दिल्ली के पुस्तक मेले में जाने का संयोग मिलेगा सोचा नहीं था, पुस्तक मेले में जाने का पूरा क्रेडिट दोस्त रचना सिंंह को जाता है. इसी दोस्त की बदौलत मैट्रो का सफ़र करना भी आ गया. सन 2007 से अब तक ब्लॉग जगत की यही एक वाहिद ब्लॉगर मित्र रहीं जिन्होंने वक्त वक्त पर हाल-चाल ही नहीं पूछा बल्कि लिखते रहने को भी कहा. 'नारी' ब्लॉग  




विश्व पुस्तक मेला  10th जनवरी 2017 पहला दिन रचना के साथ मेले में जाना यादगार बन गया. रचना और उनकी भांजी से दुबई में भी मुलाक़ात हो चुकी थी. ब्लॉग जगत की वाहिद ब्लॉगर मित्र जो सेतु बनी हमेशा मुझसे जुड़ी रहीं और आभासी दुनिया से जोड़े रखा. एक दिलचस्प बात हम दोनों की दोस्ती में यह रही कि हम दोनों के विचारों और स्वभाव में समानता होते हुए भी उन्हें व्यक्त करने या क्रियान्वित करने की सोच कुछ अलग थी. ऐसा होते हुए भी दोस्ती क़ायम रहे यही ख़ास है. इसी ख़ासियत के साथ हॉल १२ में दाख़िल हुए. सबसे पहले कुश के 'रुझान' को देखने की इच्छा थी और संयोग से वहीं पहुँच गए. कुश और रुझान से मिल कर बेहद ख़ुशी हुई.  रुझान में ही वंदना गुप्ता से मुलाक़ात हो गई जिसने फ़ौरन पहचान लिया.



कुश और रचना के साथ 'कृष्ण से संवाद' के विमोचन में भी शामिल हुए. वंदना की खिली खिली मुस्कान ने मन मोह लिया. वहीं पर अचानक आभा बोधिसत्व को देख कर ख़ुशी दुगुनी हो गई. सोचा था आभा से फिर मुलाक़ात होगी लेकिन मेले की भीड़ में खो जाना इसी को कहते हैं जो एक बार नज़र से ओझल हुआ तो फिर ना मिला !


रुझान में ही रंजना भाटिया , उनकी बेटी और उसकी नन्ही सी परी समायारा से मुलाक़ात हुई. रंजू से मिलना हमेशा परिवार के किसी अपने से मिलना जैसा एहसास दिलाता है.





 हिंद युग्म के शैलेश उम्र में जितने छोटे हैं अनुभव में उतने ही बड़े. हिंद युग्म के साथ आगे बढ़ते देख बेहद ख़ुशी हुई. वहीं पर हथकढ के किशोर चौधरी , रश्मि रविजा और कितनी परिचित अपरिचित मुस्कुराती हस्तियों से मिलना सुखद अनुभव रहा. हिंद युग्म की पूरी टीम को हार्दिक शुभ कामनाएँ !




सुखद आश्चर्य था कि विभा जी भी मेले में आने वाली थीं हालाँकि उसी रात उनकी मुंबई वपिसी की फ़्लाइट भी थी. दिल्ली के एक कोने से दूसरे कोने आना आसान नहीं था फिर भी पहुँचीं और हम मिले चाहे कुछ वक़्त के लिए. "समरथ can" की लेखिका जो थीं !!  वे वाणी प्रकाशन में दाख़िल हुईं और हमने घर लौटने की सोची.





वाणी प्रकाशन के बाहर की सजी हुई दीवार का एक अलग ही आकर्षण था. पहले दिन रचना के साथ भी वहाँ खड़े दीवार को निहारते सराहते रहे थे. वक़्त जैसे कपूर सा उड़ गया और रचना के जाने का वक़्त आ गया. माँ से वक़्त पर घर पहुँचने का वादा था इधर मेरी चिंता थी कि पहली बार अकेली कैसे घर पहुँचूँगी. उम्र के किसी भी पड़ाव पर अपनी फ़िक्र में किसी को देख कर अच्छा लगता है. कुश की निगरानी में छोड़ कर अलविदा कह कर चली गईं और मैं रुझान की रौनक़ देखने में मगन हो गई. वहीं ग़ज़लों के गुरु सुबीर जी और ग़ज़ल सम्राट नीरज गोस्वामी से कुछ पल का मिलना हुआ.

बहुत कुछ लिखना अभी बाकि है जो नहीं लिखा गया वो यादों में ताज़ा है. 

 क्रमश: 









Monday, January 30, 2017

ख़ुख़री सी आवाज़ वाला फ़ौजी - क़िताबों की चर्चा (1)





कब से बैठे हैं ये शब्द बेरोज़गार
ख्वाब दे कुछ इन्हें , इनको कुछ काम दे

खुख़री सी आवाज़ वाले फ़ौजी गौतम राजर्षि से पहली बार मिलने का सुखद अनुभव हुआ हालाँकि कश्मीर में आई बाढ़ के दिनों में चैट हुआ करती थी फिर भी आमने सामने मिलने की बात ही कुछ और होती है. उस  धारदार खरखरी आवाज़ में 'दीदी' सुन कर चरण स्पर्श करना अच्छा लगा हालाँकि मेले में मिलना भी कोई मिलना नहीं होता फिर भी मुझ जैसा सादा प्राणी कम को भी ज़्यादा समझ कर आनन्द ले लेता है. गौतम की किताब "पाल ले इक रोग नादाँ" के इंतज़ार की बदौलत कुछ देर और रुकना हो गया. आख़िरकार मेले से निकलते वक़्त वो भी मिल ही गई और जो अब पढ़ी जा रही है.

ख़्वाब जो भी बुना, वो बुना रह गया
उम्र बीती मगर बचपना रह गया


मिसरे, शेर, काफ़िए या फिर मुक्क़मल गज़ल हो उसके बनने में कानून कायदे का पूरा इल्म ना भी हो तो भी किसी भी किताब को पाठक अपने नज़रिए से पढ़ता समझता है. मेरे विचार में "पाल ले इक रोग नादाँ" की हर ग़ज़ल कई कहानियाँ कहती हुई सी लगती हैं. कई शेर मेरे दिल में उतर गए...कुछ का ज़िक्र यहाँ अपने ब्लॉग में दर्ज करने की इच्छा हुई.
रोज़ाना ही ख़ून ख़राबा पढ़कर ऐसा हाल हुआ       सहमी रहती मेरी बस्ती सुबहों के अख़बारों से"  
इस शेर को पढ़कर बड़े बेटे की याद आ गई जिसकी उम्र लगभग 9-10 साल की होगी जो टीवी में कई देशों में होती जंग और ख़ून ख़राबे को देख देख कर दुखी होता. उसका अबोध मन समझ ना पाता कि ऐसा क्यों होता है. एक दिन मेरे सामने दुनिया का नक़्शा रख दिया और  पूछने लगा, "मम्मी इस नक़्शे में देखो, बतायो यहाँ कौन सा देश है जहाँ लड़ाई नहीं होती, सब प्यार से रहते हैं ?"
धरा सजती मुहब्बत से , गगन सजता मुहब्बत से  मुहब्बत से ही खुशबू,  फूल, सूरज, चाँद होते हैं 
उस वक्त जवाब देते नहीं बना,  बेटे के सवाल ने बेचैन कर दिया था ,  शाम होने तक प्रश्नचिन्ह ने कविता का रूप ले लिया लेकिन एक आशा की किरण के साथ मन भी सँभला. मासूम बचपन सब कुछ जल्दी से आत्मसात कर लेता है इसलिए बच्चों को सबसे प्यार करते हुए चलने को कहा फिर चाहे प्रकृति , जीव-जंतु होंं या इंसान !

न मन्दिर की ही घंटी से, ना मस्ज़िद की अज़ानों से
करे जो इश्क वो समझे जगत का सार चुटकी में 

काश हम समझ पाएँ कि जगत एक खूबसूरत सपने सा है जिसे जितना प्यार और मुहब्बत से जिया जाएगा उतना 
ही आनन्द होगा जीवन में. मन में बहने वाले प्रेम की नदी उसमें सागर जैसा हौंसला भर देती है तभी तो वह विपरीत परिस्थितियों में भी सीमा पर डटा रहता है.

ऐसा इश्क का बीज पड़ा  हुआ के
नस नस  में पनपा महुआ है

अजब हैंग ओवर है सूरज पे आज
ये बैठा था कल चाँदनी बार में 

सीमा का प्रहरी अपने देश का रखवाला है लेकिन एक इंसान पहले है जो देश के लिए मर मिटने का हौंसला 
रखता है तो उस पार के दुश्मन को मरते हुए देख कर भी विचलित हो जाता है. मरता हुआ सैनिक सोचता होगा 
कि क्या जंग से किसी समस्या का समाधान हो सकता है.

मुट्ठियाँ भींचे हुए कितने दशक बीतेंगें और
क्या सुलझता है कोई मुद्दा कभी हथियार से

चीड़ के जंगल खड़े थे देखते लाचार से
गोलियाँ चलती रहीं इस पार से उस पार से

 कभी कभी फौजी का मन अपने देशवासियों से कुपित होकर सवाल भी करता, उसे लगता है कि 
दूर कहीं कोई उसे याद भी करता है कि नहीं. उसका मन तो एक छोटी सी याद बन कर दिलों में बस जाना चाहता है. 

तेरे ही आने वाले महफ़ूज़ ‘कल’ की ख़ातिर
मैंने तो हाय अपना ये ‘आज’ दे दिया है

घड़ी तुमको सुलाती है, घड़ी के साथ जगते हो
ज़रा सी नींद क्या है चीज़ पूछो इस सिपाही से
  
फौजी गौतम का कवि मन पूरे जीवन को अन्दर बाहर से समझना समझाना चाहता है इसलिए किसी भी विषय को चित्रित करने से घबराता नहीं. 

चलो चलते रहो पहचान रुकने से नहीं बनती
बहे दरिया तो पानी पत्थरों पर नाम लिखता है

‘यूँ ही चलता है’ ये कह कर कब तलक सहते रहें
कुछ नए रस्ते , नई कुछ कोशिशों की बात हो

मत चल लक़ीरों पर कभी 
जब जो भी कर अपवाद कर

ज़ुल्मों सितम पर चुप न रह 
हुंकार भर , उन्माद कर 

मुझे आज भी लेखन में छायावाद मोहता है, गौतम ने बड़े प्यार और मस्ती से निडर होकर नए निराले बिम्ब इस्तेमाल किए हैं जो सीधे दिल में उतर जाते हैं.
उबासी लेते सूरज ने पहाड़ों से जो माँगी चाय
उमड़ते बादलों की केतली फिर खौलती उट्ठी

भला कैसे नहीं पड़ते हवा की पीठ पर छाले
पहाड़ों से चहलबाज़ी में बादल का कुशन गुम है

सुलगते दिन के माथे से पसीना इस कदर टपका
हवा के तपते सीने से उमस कुछ हाँफती उट्ठी 

मौत से आँख मिला कर चलने वाला वीर कभी भावुक होकर अपने घर परिवार की यादों में गुम हो जाता है. कभी बूढ़े पिता की याद आती तो गली कूचे और उनसे जुड़ी मोहक यादों में खो जाता.

घर आया है फ़ौजी जब से थमी है गोली सीमा पर
देर तलक अब छत के ऊपर सोती तान मसहरी धूप

बाबूजी हैं असमंजस में, छाता लें या रहने दें
जीभ दिखाए लुक छिप बादल में चितकबरी धूप

बरस बीते गली छोड़े मगर है याद वो अब भी
जो इक दीवार थी कोने में नीली खिड़कियों वाली

कभी पिता बन कर बेटी का मोह जाग उठता और उसके साथ बिताए पल याद आने लगते. 
अपने शहीद साथी की बड़ी होती बेटी की चिंता सताने लगती. 

क्यूँ खिलखिलाकर हँस पड़ा ‘झूला’ भला वो लॉन का
आई ज़रा जब झूलने को एक नन्हीं सी परी

झीने से लगने लगे घर के उसे सब पर्दे
बेटियाँ होने लगीं जब से सयानी उसकी

बिन बाप के होती हैं कैसे बेटियाँ इनकी बड़ी
दिन रात इन मुस्तैद सीमा प्रहरियों से पूछ लो 

कभी आशा का संचार करता हुआ निराश मन को समझाता है जाने कितने पाठक एक मिसरे को ही पढ़ कर 
जीने का नई राह पाते होंगे.

नन्हा परिन्दा टह्नियों पर जो फुदकता है अभी
छुएगा इक दिन उड़ के वो अम्बर भले कुछ देर से

हो हौसला तो डूबती कश्ती को भी साहिल तलक
ले जाता है उम्मीद का सागर भले कुछ देर से
कुछ काफ़िए ऐसे भी जिनसे अतीत के कई पन्ने फिर से याद आने लगे तभी तो यह कहना सही लगता है कि हर पढ़ने वाला अपने नज़रिए से किसी भी लिखे पर एक खत्म न होने वाली बहस कर सकता है. 

दिल थाम कर उसको कहा ‘हो जा मेरा!’ तो नाज़ से
उसने कहा “पगले ! यहाँ पर कौन कब किसका हुआ?”

हर्फ़ों की ज़ुबानी हो बयाँ कैसे वो क़िस्सा
लिक्खा न गया है जो सुनाया न गया है

पराक्रम पदक से सम्मानित कर्नल गौतम का जितनी बहादुरी से गोली का साथ रहा उतनी ही शिद्दत से गज़ल कहने में महारत हासिल की. 

उबरते रहे हादसों से सदा
गिरे , फिर उठे, मुस्कुरा कर चले

लिखा ज़िंदगी पर फ़साना कभी
कभी मौत पर गुनगुना कर चले

लगता है जैसे बहुत कुछ लिखना रह गया हो, एक बार और पढ़ना होगा... एक बार और लिखना होगा तब तक 
के लिए इतने लिखे को ही बहुत माना जाए. 
मीनाक्षी D

Friday, January 27, 2017

सीमा का रखवाला

बादल, बिजली, बारिश
और महफ़ूज़ घरों में हम
सैनिक डटे सीमाओं पर
हर पल रखवाली में व्यस्त
रखवाली में व्यस्त ना होते पस्त
दुश्मन हो या हो क़ुदरत का अस्त्र
अचल-अटल हिमालय जैसे डटे हुए
 बर्फ़ीले तूफ़ानों में गहरे दबे हुए
आकुल-व्याकुल से नीचे धँसे हुए
घुटती साँसों से लड़ते बर्फ़ में फँसे हुए
सीमा पर लडता गोली खाके मरता
अकुला के फिर सोचे सीमा का रखवाला !
सीमाहीन जगत प्रेमी हो हर कोई सोचे ऐसा
मरने-जीने का क्रम भी प्रेममयी हो जाए
निष्ठुरता क़ुदरत की हो या हो मानव की
करुणा में बदले, स्नेहमयी सृष्टि हो जाए !!

"मीनाक्षी धंवंतरि" 

Thursday, January 26, 2017

गणतंत्र दिवस 

दिल्ली से दुबई तक गणतंत्र दिवस का जश्न देखने और मनाने का आनंद अलग ही सुख दे रहा है. कई बरसों बाद पहली बार विश्व पुस्तक मेला देखा और अब गणतंत्र दिवस देखने का सौभाग्य मिला चाहे टीवी के सामने. दसवीं क्लास से कॉलेज ख़त्म होने तक हर साल परेड पर घर परिवार और मित्रों को लेकर जाने का ज़िम्मा जोश से पूरा करती थी. कॉलेज के आख़िरी साल में एन॰एन॰सी॰ की बदौलत ग़ैरिसन ग्राउंड में शामिल होने की याद भी ताज़ा हो गई.

"बादल, बिजली, बारिश
 और महफ़ूज़ घरों में हम
 सैनिक डटे सीमाओं पर
 हर पल रखवाली में व्यस्त"

 "देश महल है मेरा
 सजा सुनहरे कँगूरों से
 मेरा दिल सजदा करता
 नींव की ईंट बने वीरों का"

देश-विदेश के सभी मित्रों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएँ !!