Friday, December 7, 2007

यह प्रश्न चिन्ह है लगा हुआ !!

"सैकड़ो निर्दोष लोगों का खून बहाया गया मुझे उस से दर्द होता है. " अभय जी की इस पंक्ति ने अतीत में पहुँचा दिया. जब दस साल का बेटा वरुण साउदी टी.वी. में हर तरफ फैले युद्ध की खबरें देख कर बेचैन हो जाया करता. दुनिया का नक्शा लेकर मेरे पास आकर हर रोज़ पूछता कि कौन सा देश है जहाँ सब लोग प्यार से रहते हैं...लड़ाई झगड़ा नहीं करते .हम वहीं जाकर रहेंगे...अपने आप को उत्तर देने में असमर्थ पाती थी. ..तब मेरी पहली कविता का जन्म हुआ था उससे पहले गद्य की विधा में ही लिखा करती थी.
रियाद में हुए मुशायरे शाम ए अवध में पढ़ी गई यही पहली हिन्दी कविता थी.

प्रश्न चिन्ह

थकी थकी ठंडी होती धूप सी
मानवता शिथिल होती जा रही

मानव-मानव में दूरी बढ़ती जा रही
क्यों हुआ ; कब हुआ; कैसे हुआ ;

यह प्रश्न चिन्ह है लगा हुआ !!!!

क्या मानव का बढ़ता ज्ञान
क्या कदम बढ़ाता विज्ञान !

क्या बढ़ता ज्ञान और विज्ञान
मन से मन को दूर कर रहा !

यह प्रश्न चिन्ह है लगा हुआ !!!!

मानव में दानव कब आ बैठ गया
अनायास ही घर करता चला गया !

मानव के विवेक को निगलता गया
कब से दानव का साम्राज्य बढ़ता गया !

यह प्रश्न चिन्ह है लगा हुआ !!!!

कब मानव में प्रेम-पुष्प खिलेगा ?
कब दानव मानव-मन से डरेगा ?

कब ज्ञान विज्ञान हित हेतु मिलेगा ?
क्या उत्तर इस प्रश्न का मिलेगा ?

यह प्रश्न चिन्ह है लगा हुआ !!!!

क्रमश:

8 comments:

Gyandutt Pandey said...

कविता बहुत सुंदर है। निर्दोष का मारा जाना क्षुब्ध करता है।
यह भी है कि मैं विश्व-देश-काल की परिस्थितियों में महाभारत को भी जायज मानता हूं। युद्ध की अपनी तार्किकता है और अपना महत्व। मां काली का पदाघात कभी कभी अनिवार्य हो जाता है। वह विकास का अनिवार्य अंग है।

अभय तिवारी said...

सुन्दर कविता है मीनाक्षी जी.. बहुत बधाई और शुभकामनाएं..
ज्ञान भाई की बात भी सही है.. दिक़्क़्त बस इतनी सी है कि माँ काली का पदाघात अनिवार्य विकास का अंग तभी तक लगता है जब वो सामने वाले के सीने पर हो रहा हो.. जैसे ही पलट कर अपने पर होने लगता है.. माँ काली की जगह असुर सत्ता नज़र आने लगती है!

mahashakti said...

मार्मिक कविता, विचारर्णीय प्रश्‍न है।
अगली कड़ी का इन्‍तजार रहेगा।

मीनाक्षी said...

ज्ञान जी. यहाँ मैं आपसे सहमत नहीं.. दुर्गा का पदाघात आसुरी शक्तियों को नष्ट करते हुए कई मासूमों को भी कुचल डालता है तब सवाल खड़ा होता है युद्ध आखिर क्यों...!
अभय जी , अपने या पराए किसी मासूम पर भी यह वार मन को विचलित कर जाता है.
धन्यवाद महाशक्ति ..युद्ध क्यों. इस विचार होना ज़रूरी है..

parul k said...

व्याकुल मन:स्तिथि को कितने सुंदर ढ़ं ग से आपने लय ्बद्ध किया है दी,बधायी

बाल किशन said...

व्याकुल मनः स्थिति को एक अति सुंदर कविता के माध्यम से प्रकट करने के लिए बधाई.

Sanjeeva Tiwari said...

समाज में करूण और दया के भाव को कायम रखने का दायित्‍व भी हम सब का है । युद्ध की अनिवार्यता को भी यही दो भाव सुलह में बदल देते हैं पर माल्‍थस का जनसंख्‍या सिद्धांत का सत्‍य ? भी तो अटल है । प्रकृति, संसाधन व जनसंख्‍या में संतुलन इन्‍ही तत्‍वो के सहारे तो करती है । इसे स्‍वीकारते हुए करूणा और दया के भाव के हम वाहक बने रहें क्‍योंकि सच्‍चे अर्थों में यही हमारी (भारतीयता की) पहचान है ।

पुनीत ओमर said...

विकास अपने साथ कुछ संघर्स्छ अवश्य लाता है. चाहे हमारा आर्थिक विकास हो, सामजिक विकास हो, सभ्यताओं का विकास हो, देशो की शक्तियों का विकास हो, या कुछ और भी.... हमेशा अपने को बड़ा करना नहीं दुसरे को छोटा भी किया जाता है और यही जन्म देता है संघर्ष को.